उत्तराखंड में जून महीने के दौरान बिजली की मांग ने ऊर्जा विभाग की चिंताओं को बढ़ा दिया है. गर्मी बढ़ने के साथ प्रदेश में बिजली की खपत लगातार नए स्तर पर पहुंच रही है, जबकि राज्य की अपनी उत्पादन क्षमता मांग के मुकाबले काफी कम साबित हो रही है. यही वजह है कि सरकार और ऊर्जा निगमों को एक तरफ बाजार से महंगी बिजली खरीदनी पड़ रही है तो दूसरी तरफ उद्योगों की बिजली आपूर्ति में कटौती जैसे कदम भी उठाने पड़ रहे हैं.
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद तेजी से औद्योगिक विकास, शहरीकरण और आबादी में वृद्धि देखने को मिली है. इसके साथ ही घरेलू, व्यावसायिक और औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली की जरूरत भी लगातार बढ़ी है. बीते सालों में सरकार ने उत्पादन बढ़ाने, नई जल विद्युत परियोजनाओं को आगे बढ़ाने और सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित करने जैसे कई प्रयास किए हैं, लेकिन इसके बावजूद प्रदेश आज भी अपनी कुल जरूरत का बड़ा हिस्सा खुद उत्पादित नहीं कर पा रहा है.जून महीने के आंकड़े इस चुनौती को और स्पष्ट करते हैं.
प्रदेश में इन दिनों प्रतिदिन बिजली की मांग करीब 6.1 करोड़ यूनिट तक पहुंच गई है. दूसरी ओर राज्य की अपनी उत्पादन क्षमता केवल 1.8 करोड़ यूनिट प्रतिदिन के आसपास है. इसका सीधा मतलब है कि उत्तराखंड अपनी कुल मांग का 40 प्रतिशत बिजली भी खुद पैदा नहीं कर पा रहा है. ऐसे में ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए राज्य को दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ रहा है.हालांकि केंद्रीय पूल से मिलने वाली बिजली इस स्थिति में बड़ी राहत दे रही है. फिलहाल में प्रदेश को केंद्रीय पूल से लगभग 2 करोड़ यूनिट बिजली मिल रही है.
यदि राज्य के अपने उत्पादन और केंद्रीय पूल की बिजली को जोड़ दिया जाए तो कुल उपलब्धता करीब 3.8 करोड़ यूनिट प्रतिदिन तक पहुंचती है. लेकिन यह आंकड़ा भी कुल मांग के मुकाबले काफी कम है.यानी 6.1 करोड़ यूनिट की मांग के मुकाबले करीब 3.8 करोड़ यूनिट बिजली ही उपलब्ध हो पा रही है. ऐसे में लगभग 2 करोड़ यूनिट से अधिक बिजली की कमी को पूरा करने के लिए उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPCL) को खुले बाजार से बिजली खरीदनी पड़ रही है.