पशु बलि प्रथा पर रोक लगाने की मांग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत


पशुओं की, पक्षियों की बलि, बकरा ईद,आदि जो अपने देवी देवताओं को प्रसन्न करने के नाम पर कुप्रथा चली हुई है उस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए हरिद्वार के अरुण भदोरिया एडवोकेट, कमल भदोरिया एडवोकेट और श्रीमती सुमेधा भदोरिया एडवोकेट पत्नी श्री अनिरुद्ध प्रताप सिंह ,चेतन भदोरिया LLB अध्यनरत ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली में प्रमुख सचिव गृह भारत सरकार को पक्षकार बनाते हुए एक याचिका दाखिल की है जिसमें याचिका में बताया गया है की मां कामाख्या देवी मंदिर परिसर असम में या बकरा ईद के नाम पर जो पशु बलि के नाम पर जो अत्याचार हो रहा है वास्तविकता तो यह है कि कोई भी देवी, भगवान , या ऊपर वाला ,अपने को खुश करने के लिए किसी प्रकार की बलि ना तो मांगती है ना ही ऐसा कहीं उल्लेख है सत्यता तो यह है कि इस प्रकार की पशु बलि से मां कामाख्या देवी काफी नाराज है जिससे वर्तमान में देश में नई-नई बीमारियां पैदा होने के कारण से ही आम आदमियों को समझ जाना चाहिए ,वर्तमान समय में अनेक धर्मस्थलों ,मेला, उत्सवों व अन्य आयोजनों में बकरा ईद के नाम पर देवी देवताओं को प्रसन्न करने के नाम पर बकरों, भैंसे ,मुर्गों तथा अन्य पशु पक्षियों की बलि जो दी जाती है.

इस प्रक्रिया में पशुओं को अत्यधिक पीड़ा होती है एवं कष्ट का सामना करना पड़ता है जो कि पशुओं के प्रति करुणा और संरक्षण की भावना के विपरीत है कानून में भारत का संविधान अनुच्छेद 51 ए (जी) के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक पर सभी जीव धारी के प्रति करुणा रखने का मूल कर्तव्य निर्धारित करता है और अनुच्छेद 48 ए पर्यावरण एवं वन जीवन की सुरक्षा एवं संरक्षण का निर्देश देता है पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 का मूल उद्देश्य भी पशुओं को अनावश्यक पीड़ा एवं यातना से बचाना है इसके बावजूद फिर भी अलग-अलग धर्म में अलग-अलग स्थान पर सार्वजनिक रूप पशु बलि की घटनाएं लगातार जारी हो रही हैं जिससे पशु कल्याण संबंधी कानून की भावना भी प्रभावित होती है साथ ही इस कुप्रथा से निम्न प्रकार की गंभीर समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं जैसे पशुओं को अनावश्यक एवं अत्यधिक शारीरिक एवं मानसिक कष्ट होता है, समाज में हिंसा एवं क्रूरता की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है, बच्चों एवं युवाओं पर नकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है ,पशु कल्याण एवं संवैधानिक मूल्यों का हनन होता है ,भारत की अहिंसा और करुणा की संस्कृती परंपरा को आघात पहुंचता है, साथ ही गंभीर किस्म के अपराध किसी का कत्ल करना उसका भी वह अपराधी को भय नहीं होता है ।

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए और बलि प्रथा को कुप्रथा मानते हुए हरिद्वार के भदोरिया एडवोकेट एसोसिएट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली से अपनी याचिका में यह मांग थी कि देश भर में प्रचलित बलि कुप्रथा पशु एवं पक्षी, बकरा ईद ,देवी देवताओं को खुश करने के बहाने के नाम पर तत्काल बंद कराई जाए ।भारत सरकार एवं राज्य सरकार को पशु बलि पर प्रभावी प्रतिबंध लगाने हेतु आवश्यक अनुशंसाएं प्रेषित की जाए ,पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वन हेतु दिशा निर्देश जारी किए जाएं, जिला प्रशासन एवं पुलिस अधिकारी को पशु बलि से संबंधित मामलों में कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक आदेश जारी किया जाए ,पशुओं के प्रति करुणा एवं संरक्षण के संबंध में राष्ट्रीय स्तर पर जन जागरूकता अभियान संचालित किया जाए और याचिका में यह भी मांग की है कि केंद्र सरकार तत्काल प्रभाव से पशु बलि के नाम पर दी जा रही बलि को पूर्ण रूप से रोके जाने हेतु राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली को तत्काल आदेश पारित करें ताकि यह कुप्रथा बंद हो सके।








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